सरयूपारीण ब्राह्मण, गोत्र, प्रवर और घर

सरयूपारीण ब्राह्मण - परिचय  

By - Ved P Mishra, PhD 

सरयूपार की सीमा  
सरयूपार भू-भाग की सीमा दक्षिण में सरयू नदी, उत्तर में सारन और चंपारण का कुछ भाग, पश्चिम में मणिराम या रमरेखा नदी, पूर्व में गंगा और गंडक (शालिग्रामी) नदी का संगम है। इस सरयूपार क्षेत्र की लम्बाई पूर्व से पश्चिम तक सौ कोस के लगभग है। उत्तर से दक्षिण तक पचास कोस से कुछ अधिक है। इस क्षेत्र को "सरदार" कहते हैं। कुछ विद्वान इसकी सीमा अयोध्या से हरिहर क्षेत्र तक मानते हैं।  

सरयूपारीण ब्राह्मण  
इस क्षेत्र के अंतर्गत ब्राह्मणों का जो वर्ग उत्पन्न हुआ है, उसको "सरयूपारी" या "सरयूपारीण" ब्राह्मण कहते हैं। ये ब्राह्मण सरयू नदी के उत्तरी तट पर निवास करने वाले हैं। इनमें उपाध्याय, ओझा, चौबे, तिवारी, दूबे, पाठक, पांडे, मिश्र और शुकुल भी कहलाते हैं। यह ब्राह्मण वर्ग स्वतंत्र है। यह वर्ग यहाँ का मूल निवासी है। इसके पूर्वज कान्यकुब्ज आदि अन्य ब्राह्मण नहीं थे।  

आयस्पद  
वे ब्राह्मण सरदार में जिन गाँवों में बसे हुए हैं, उनको आयस्पद (स्थान) कहते हैं। आप कौन आयस्पद हैं? ऐसा पूछने पर वे ब्राह्मण उस स्थान के साथ अपने ब्राह्मण वंश का नाम जोड़कर परिचय देते हैं, जैसे – मामखोर के शुकुल, प्यासी के मिश्र आदि।  

गोत्र आदि  
प्रत्येक ब्राह्मण किसी एक ऋषि की सन्तान परंपरा में आता है। यह ऋषि "गोत्रकर" कहलाता है। ब्राह्मण का नाम ही ब्राह्मण होता है। जैसे—मामखर के शुकुल, प्यासी के मिश्र आदि। गोत्र से ब्राह्मण का धर्म और कर्म निर्धारित होता है। गोत्र के नाम पर ही विवाह और धार्मिक नियम बनते हैं। इसीलिए कहा गया है कि ब्राह्मण शुभ और अशुभ कार्य में संस्कारपूर्वक वचन में अपना गोत्र और प्रवर अवश्य कहे। जैसे—मैं गौतमगोत्रीय वशिष्ठप्रवरान्वित अमुक नाम आदि।


               समान गोत्र और प्रवर में विवाह नहीं करना चाहिए। इसलिए भी इसकी आवश्यकता पड़ती है। इसके साथ ही प्रत्येक गोत्र का वेद, शाखा, ऋषि, शिष्य, उपदेश, शाखा और शुद्ध, पताका आदि भी निश्चित हैं। प्रत्येक गोत्र का ब्राह्मण अपने गोत्र के वेद, उपवेद, शाखा और शुद्ध, पताका का से दाहिने या बाएँ हाथ और सिर सहित शुद्धता आदि पद का भी पादोपली मार कर बैठने और पैर धुलाने में चिह्न बाँधें पाद का प्रयोग करता था। अपने निश्चित देवता को पूजता और उपासना करता था।  

जीविका का "वह सब पढ़ना, पूजना और करना" प्रवर में निर्दिष्ट था। ब्राह्मणों में वसिष्ठ, पुलस्त्य, पुलह, कश्यप, कौण्डिन्य, काश्यप, गर्ग, आत्मनेय, पराशर, भारद्वाज, मनव, वत्स, औत्रेय, शाण्डिल्य (सोहोत्रीय), कौशिक, सौवर्ण (औपस), शाण्डिल्य (औपस) इत्यादि प्रवर प्रसिद्ध हैं। प्रत्येक गोत्र का नाम ब्राह्मणों में प्रचलित है, जैसे—कश्यप, भारद्वाज, गौतम, वत्स, कौशिक, सौवर्ण, पराशर, शाण्डिल्य, गार्ग्य, उपमन्यु, शांडिल्य आदि।  

सर्वसाधारण रूप से प्रत्येक गोत्र में तीन प्रवर होते हैं, कुछ में दो और कुछ में चार या पाँच भी होते हैं। समान गोत्र और समान प्रवर के स्त्री-पुरुष का आपस में विवाह निषिद्ध है। ऐसा करने से संतानों में दोष उत्पन्न होते हैं। एक गोत्र में कई शाखाएँ होती हैं। प्रत्येक शाखा में जो भेद हैं, वे कालक्रमानुसार उत्पन्न हुए हैं। अतः वर्तमान में यदि एक गोत्र के सब लोग समान नहीं कहे जा सकते, तथापि वे सब एक ही मूल से उत्पन्न हैं।  

सरयूपारी ब्राह्मणों में प्रत्येक गोत्र वाले लोग एक स्थान पर रहने वाले और परिवार वृद्धि तथा जीविका वश दूर दर कर बसने वालों को अपना घर मानते हैं। आप कहाँ के हैं? ऐसा पूछने पर जो स्थान तत्सम घर देते हैं, उदाहरण के लिए पांडे, त्रिपाठी आदि यशुवंशी हैं। इनका घर सरयूपारी ब्राह्मण लोग और तरह-तरह से बँटे हुए हैं। इस घर का भाव यह है कि गर्ग, गार्ग्य और शाण्डिल्य गोत्र और उनके प्रवर तीन घर और तीन ब्राह्मण में बँटे हुए हैं। दूसरे घर में पांडे, मिश्र, तिवारी और पाठक आते हैं। तीसरे घर में मामखर शुक्ल (मिश्र), मध्यम मित्र (मिश्र) और श्री सोहनलाल त्रिपाठी (शाण्डिल्य) में हैं।  

तेरह घर में  
(१) इतवारी पाण्डेय  
(२) इटिया पाण्डेय  
(३) त्रिपल पाण्डेय  
(४) गंगाजली पाण्डेय  
(५) गिरजा पाण्डेय  
(६) राधेश्याम पाण्डेय  
(७) श्रीधर पाण्डेय  
(८) गुरुचरण द्विवेदी  
(९) बड़ोली (भूत पाण्डेय) द्विवेदी  
(१०) सितारी द्विवेदी  
(११) त्रिवेदी  
(१२) सीधी त्रिवेदी  
(१३) सीधी त्रिपाठी  

ये सब तेरह घर के अंतर्गत आते हैं। यह विभाजन उस समय इन ब्राह्मणों के संगठन और विवाह के दृष्टिकोण से किया गया था। छोटे-बड़े घरों में उच्च-नीच की भावना नहीं है।


मुख्य बिंदु:  
1. प्रत्येक ब्राह्मण किसी एक ऋषि वंश (गोत्र) से संबंधित होता है।  
2. समान गोत्र और समान प्रवर में विवाह वर्जित है।  
3. सरयूपारी ब्राह्मण सरयू नदी के उत्तर भाग के निवासी हैं।  
4. “तेरह घर” पहचान का सामाजिक विभाजन है, न कि ऊँच-नीच का।  
5. गोत्र, प्रवर और आयस्पद – ये तीन चीजें ब्राह्मण की पहचान का आधार हैं।




(डॉ वेद प्रकाश मिश्र)

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